आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

हरिभक्ति – नारद – पंचरात्र

श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं – “बाबू, हरिभक्ति की कोई कथा – ”

महिमाचरण – “आराधितो यदि हरिस्तपसा तत: किम् !
नाराधितो यदि हरिस्तपसा तत: किम् !!

अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा तत: किम् !
नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा तत: किम् !!

विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स !
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शंकरं ज्ञानसिन्धुम् !!

लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम् !
भवनिगड निबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च!!

” ‘नारद – पंचरात्र’ में है कि नारद जब तपस्या कर रहे थे, उस समय यह दैववाणी हुई – ‘यदि हरि की आराधना की जाय तो फिर तपस्या की क्या आवश्यकता ? और यदि हरि की आराधना न की जाय तो भी तपस्या की क्या आवश्यकता ? अन्दर बाहर यदि हरि ही हो तो फिर तपस्या का क्या प्रयोजन ? और अन्दर बाहर यदि हरि न हों तो फिर तपस्या का क्या प्रयोजन ? अतएव हे ब्रह्मन्, तपस्या से विरत होओ ! वत्स, तपस्या की क्या आवश्यकता है! हे द्विज, शीघ्र ही ज्ञानसिन्धु शंकर के पास जाओ! वैष्णवों ने जिस हरिभक्ति की महिमा गायी है उस सुपक्व भक्ति का लाभ करो! इस भक्तिरुपी कटार से भवबन्धन कट जायेंगे!’ “

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