आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

गाना गाकर ही रामप्रसाद सिद्ध हुये थे – श्रीरामकृष्ण

श्रीरामकृष्ण – इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना – सुषुम्ना के भीतर सब पद्म हैं – सभी चिन्मय! जैसे मोम का पेड़, – डाल, पत्ते फल, – सब मोम के! मूलाधार पद्म में कुण्डलिनी-शक्ति है! वह

पद्म चतुर्दल है! जो आद्याशक्ति हैं, वही कुण्डलिनी के रुप में सब की देह में विराजमान हैं – जैसे होता हुआ साँप कुण्डलाकार पड़ा रहता है! ‘प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी!

(मणि से)  भक्तियोग से कुलकुण्डलिनी शीघ्र जागृत होती है! इसके बिना जागृत हुए ईश्वर के दर्शन नहीं होते! तुम एकाग्रता के साथ निर्जन में गाया करना –

” ‘जागो माँ कुलकुण्डलिनी! तुम नित्यानन्द-स्वरुपिणी!

‘प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी!

“गाना गाकर ही रामप्रसाद सिद्ध हुये थे! व्याकुल होकर गाना गाने पर ईश्वरदर्शन होते हैं!

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