आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

अपना सच्चा मुँह देखना है – अपने स्वरुप को पहचानना – श्रीरामकृष्ण परमहंस

“घास खाना  है कामिनी-कान्चन लेकर रहना! बकरियों की तरह ‘में में’ करना और भागना है – सामान्य जीवों की तरह आचरण करना! बाघ के साथ जाना है – गुरु, जिन्होंने ज्ञान की

आँखें खोल दीं, उनकी शरणागत होना, उन्हें ही आत्मीय समझना! अपना सच्चा मुँह देखना है – अपने स्वरुप को पहचानना – श्रीरामकृष्ण परमहंस

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