आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

Eswar

ईश्वर लाभ ही जीवन का उद्देश्य है! तुम लोग संसार में हो तो क्या, उसमें दोष नहीं! फिर भी ईश्वर में मन रखना और यह जानना कि यह सारा घर परिवार मेरा नहीं, यह सब ईश्वर का है! मेरा घर ईश्वर के पास है!

और कहता हूँ कि उनके पाद्पद्मों में भक्ति के लिए उनसे व्याकुल होकर सर्वदा प्रार्थना करना!  सारे कार्य करना लेकिन मन ईश्वर में रखना! एक हाथ से कर्म करना और दूसरे हाथ से ईश्वर को पकड़े रहना! कर्म समाप्त हो जाये तो तब दोनों हाथ से ईश्वर को पकड़ लेना!

ईश्वर में भक्तिलाभ किये यदि संसार करने जाओगे तो और भी जकड़ जाओगे! और जितना ही विषय चिन्तन करोगे उतनी ही आसक्ति बढ़ेगी! उनसे प्यार करने पर विवेक वैराग्य अपने आप हो जाते  हैं!

कभी भगवान चुम्बक है, भक्त सुई और कभी भक्त चुम्बक हैं, भगवान सुई! भक्त का ऐसा आकर्षण है कि उसके प्रेम में मुग्ध होकर भगवान उसके पास खींचे चले आते हैं!

प्रेम रस्सी के समान है! प्रेम उत्पन्न होने पर ईश्वर भक्त से बँध जाते हैं! और उससे हाथ नहीं छुड़ा पाते!

विश्वास होने से  ही हुआ! विश्वास से बड़ी और कोई वस्तु नहीं!

परमहंस रामकृष्णदेव

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