आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

मन रखो ईश्वर में

Bhagwan RamKrishna Dev

सर्वदा ईश्वर का नाम-गुणगान करना चाहिए, सत्संग करना चाहिए – बीच बीच में भक्तों और साधुओं से मिलना चाहिए! संसार में दिनरात विषय के भीतर पड़े रहने से मन ईश्वर में नहीं लगता! कभी कभी निर्जन में जाकर ईश्वर की चिन्ता करना बहुत जरुरी है! प्रथम अवस्था में बीच बीच में एकान्तवास किए बिना ईश्वर में मन लगाना बड़ा कठिन है!

“पौधे को चारो ओर से रुँधना पड़ता है, नहीं तो बकरी चर लेगी!

“ध्यान करना चाहिए मन में, कोने में और वन में! और सर्वदा सत्-असत् विचार करना चाहिए! ईश्वर ही सत् अथवा नित्य वस्तु है, और सब असत्, अनित्य! बारम्बार इस प्रकार विचार करते हुए मन से अनित्य वस्तुओं का त्याग करना चाहिए!

“सब काम करना चाहिए परन्तु मन ईश्वर में रखना चाहिए!

“कछुआ रहता तो पानी में है, पर उसका मन रहता है किनारे पर जहाँ उसके अण्डे रखे हैं!

“बिना भगवद्-भक्ति पाए यदि संसार में रहोगे तो दिनोंदिन उलझनों में फँसते जाओगे और यहाँ तक फँस जाओगे कि फिर पिण्ड छुड़ाना कठिन होगा! रोग, शोक, तापदि से अधिर हो जाओगे! विषय -चिन्तन जितना ही करोगे, आसक्ति भी उतनी ही अधिक बढ़ेगी!

“हाथों मे तेल लगाकर कटहल काटना चाहिए! नहीं तो, हाथों में उसका दूध चिपक जाता है! भगवद्-भक्तिरुपी तेल हाथों लगाकर संसाररुपी कटहल के लिए हाथ बढ़ाओ!

“संसार जल है और मन मानो दूध! यदि पानी में ड़ाल दोगे तो दूध मानी में मिल जाएगा, पर उसी दूध का निर्जन में मक्खन बनाकर पनी में छोड़ोगे तो मक्खन पानी में उतराता रहेगा!
इस प्रकार निर्जन में साधना द्वारा ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके यदि संसार में रहोगे तो भी संसार से निर्लिप्त रहोगे!

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