आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

सफलता को आत्मसात करना सीखो

हम सब में सफलता को आत्मसात करने का गुण होना चाहिये! यह देखा गया है कि हम  ऊँचे उद्देश्य और लक्ष्य के साथ जीते हैं! जिस तरह से हम अन्न, जल, वायु को पचा लेते हैं, उसी तरह सफलता को भी अपने में समाहृत कर लें! यह हमें और उत्साह, उमंग, जोश, शांति प्रदान करे! यह सफलता का एक सही रुप है!

इसके विपरीत अगर यह हमें अपने मार्ग से हटा दे, लक्ष्य से भटका दे, तब इस पर गौर करने की जरुरत है!

यह देखा गया है कि हम अपने जीवन में किसी को आदर्श रुप में चुनते हैं! अपने जीवन को छोटे तौर पर एक उद्देश्य देते हैं! फिर सांसारिक दौर से गुजरते हुये लक्ष्य पर केन्द्रित रहते हैं! पर जब शुरुआत में कोई सफलता हाथ लगती है, तब भटकने का प्रक्रम शुरु हो जाता है! लगता है अब हमें किसी पथ-प्रदर्शक की जरुरत नहीं हे! जिस समाज, समुदाय, संघ, व्यवस्था में रहते हैं, वह छोटा दिखाई पड़ने लगता है! लगता है अब हम तो इन सब से उच्च हो गये हैं! अब हमे इन सब की आवश्यकता कहाँ! और फिर शुरु होता है भटकने का दौर! हम जिस व्यवस्था में यह हासिल करते हैं, उसे ही तुच्छ मानने की भूल कर बैठते हैं! जबकी इसके परे हमें उस तन्त्र को मजबूत करने की आवश्यकता रहती है! शांति के साथ अपने आदर्श की ओर जुड़ी रहनी चाहिये! पर सब छोड़-छाड़ कर हम स्वयं के प्रति भूल कर बैठते हैं! यह हमें शांति और स्थिरता की जगह अशांत और अस्थिर कर देता है!

यह रवैया न केवल आत्मघाती है वरन् अगली पीढ़ी को मिलने वाले प्रोत्साहन से  भी वंचित करने का काम करती है! कोई भी गुरु, संघ या समुदाय कबतक किसी को आगे बढ़ने का उपाय करती रहेगी अगर ऐसा नतीजा रहा !

अत: जीवन में मिल रहे और मिलने वाले सफलता को अगली सफलता की सीढ़ी के रुप मे लेते रहें! स्वयं को ऐसे अवसर पर संतुलित रखें! जीवन में हर सफलता को आत्मसात कर जीवन के सर्वोच्च सत्य, लक्ष्य के प्रति जागरुक, सतर्क रहें!

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