आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

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गुरु-शिष्य का सम्बन्ध मधुर बना रहे

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गुरु शिष्य का सम्बन्ध एक-दूसरे को भव-सागर पार करने के लिये होता है! समय के मार से अगर कोई गुरु अपने शिष्य को बचाता है, तब इसके पीछे एक शुभता छिपी रहती जो शिष्य को अपने सद् मार्ग पर निर्भीकता से बढ़ने के लिये प्रबल साहस प्रदान करता है! इसके विपरीत अगर कोई विमूढ़ अपने आप को दंभ का भंड़ार बना ले तथा अपने गुरु के पीछे उन्हीं को निरुत्साहित करने लग जाये, सम्बन्धों को धन से तौलने लग जाये, यह शिष्य को गर्त में ले जाने का सहज रास्ता बन जाता है!

हर किसी नजदीकी  के मार्ग की प्रगति को अपने प्रगति में बाधा के रुप में लेने लग जाये, किसी से किसी को अगर मिला दे उसकी कीमत लेने  व लगाने लगे, बात न बने तब एक-दूसरे के खिलाफ आग उगलने लगे,  जब कोई भी ऐसा काम न होने पाये तब अन्त में गुरु को ही समाज में सबसे पीछे, गिरा हुआ, दलित के रुप में देखने, और दिखाने लगे, यह शिष्य के प्रतिभा की कमी को इंगित करता है!

गुरु अगर शिष्य को दंडित नहीं करते हैं, तब यह अहोभाग्य नहीं वरन् शिष्य के लिये दुर्भाग्य हीं है! वह अपने हर कृत्य के साथ गुरु से दूरी को बढ़ाता जा रहा है! जहाँ लोग सच्चे गुरु की तलाश में भटकते रहते हैं, वहीं कुछ लोग अपने सौभाग्य को झूठे अहंकार, मान-मर्यादा और अयोग्यता के समक्ष गुरु को ही तुच्छ समझने की भूल कर बैठते हैं!

किसी के परिवार में कलह की स्थिति पैदा करके कोई कितने दिन तक जीवन की सहज अवस्था को बरकरार रख सकते हैं, भले ही महान गुरु शिष्य के ऐसे कृत्य को दरकिनार करते रहें, अपने उपर लेते रहें!

 

“वाकदन्डं प्रथम दन्डं” – अभी के लिये इतना ही काफी है, अगर आगे ऐसे हीं करते रहें, तब आपकी काफी क्षति उठानी पर सकती है! अब भी समय है! समय रहते गुरु के प्रति अपने निकृष्ट  रवैये को सुधार लो! गुरु जब आपको आगे बढ़ने में सहायक रहे हैं, तब उन्हें पीछे न धकेलो! ईश्वर के प्रकोप से बचो! गुरु ईश्वर के दुलारे होते हैं! वे कब तक अपने दुलारे के अपमान को बर्दाश्त करेंगे! इसके पहले कुछ अनहोनी हो जाये,  अपने नकारात्मक रवैये को बदल लो! गुरु के प्रति श्रद्धा करना सीखो! आगे से यह बताने के लिये भी कोई आगे न आएगा! अभी भी समय है, दोहरे, खोखले मान-सम्मान के परिधि से बाहर आ जाओ! गुरु क्षमाशील होते हैं! बच्चा संभल जाओ! समझ जाओ!!

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One thought on “गुरु-शिष्य का सम्बन्ध मधुर बना रहे

  1. bhavsajar ke bandhan se tarne ke leye guru hi ek matra aavlamb h
    jo kshamasil hoti hi h,
    sisya ko dum bhar rahit hona hi hoga aagaye prabhu ki lilla aparampar h..
    nd its is very nice nd motivated thought…