आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

विचारों के प्रवाह को दरकिनार करते चलें

हम विचारों के भँवर में पड़े रहते हैं!  एक पर एक विचार बिन बुलाये मेहमान की तरह बिना दस्तक दिये आते चले जाते हैं! इससे हमारा कल्याण तो होता नहीं, वरन् और हम अपने लक्ष्य से दूर होते चले जाते हैं! किसी महापुरुष ने कहा है कि अगर आप कुआँ खोदने चाहते हैं तब एक ही जगह विचार कर पूरी खुदाई करें, सफलता हाथ लगती है! इसी तरह विचारों के भाग-दौड़ मनुष्य को दिशा अवश्य देते हैं, पर स्थायित्व में गड़बड़ी मचा देते हैं! आप एक विचार को अपने अन्दर उतार लें, तब आपमें आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी व लक्ष्य के प्रति अधिक ऊर्जा आनी शुरु हो जायेगी! विचारों के अनचाहे प्रवाह को अपने योग्यता/स्वभाव के अनुरुप दूर धकेल दें! आप अपने आजमाये तरीके से उसे निरस्त करते चलें! विचारवान होना अच्छी बात है, पर यह विचारों का अनावश्यक प्रवेश काफी अहितकर है खासकर कि तब जब आप स्थायित्व की तरफ कदम बढ़ा रहे हों! इसके संयम से आप अपने लक्ष्य के प्रति अधिक समर्पित और जागरुक व सफल रहेंगे!

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