आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

आत्म-अनुसंधान

जीवन में आगे बढ़ते हुये, आत्मिक संतुष्टि को बरकरार रखना भी साधना की सफलता को ही इंगित करता है! यदि यह संतुष्टि कहीं खोई सी प्रतीत हो रही है तब शायद उस मार्ग का अनुगमन कर रहे हैं जो आपके अनुरुप नही है या त्रुटि की पूर्ण संभावना है! जब कभी ऐसा लगे, जीवन में ठहराव लायें! यह आपको आपके सही मार्ग के सामने लाकर रख देता है! अनायास /सहायास कुम्भक इस ठहराव में काफी अहम भूमिका निभाता है! यह आत्मिक उन्नति का सहज मार्ग है! आपका ठहराव ही ईश भाव को आने का मौका देता है! ईश्वर आपमें उतरने लगते हैं! शरीर में विद्युत की मात्रा बढ़ने लगती है! शरीर के विभिन्न हिस्से सक्रिय हो उठते हैं! शरीर में स्पन्दन अनायास ही होने लगते है! बस आप ठहराव को, कुम्भक को, ईश्वर को प्रश्रय देते चले जायें, मार्ग सुगम से सुगमतर होता व दिखता चला जाता है!

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