आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

महामाया की माया

इंसान जब ईश्वर के पीछे जब लग जाता है या ईश्वर को पाना चाहता है, महामाया अपना जाल जीव पर फेंकती है! उसे नाना तरह के परीक्षाओं या कहिये मुसीबतों के द्वार पर खडा कर देती हैं! जीव जब अत्यन्त अकुला जाता है या कहिये धैर्य खोने लगता है तब उसका सही समय शुरु कर देते हैं ताकि वह सांसारिक आनन्द मे खोया रह जाये! और लगभग यही होता है अधिकांश मनुष्यों के साथ! इस तरह दु:खों एवं सुखों के द्वन्द्व में इंसान को भटकाते रहती है! पर हम महामाया के इस माया को देखें व समझें व अपने लक्ष्य से भ्रमित न हों! महामाया ! न यह ईश्वर को छोडेगा न आपको! चौकन्ना रहिये! भ्रमित हों या सुखी या दु:खी पीछा नहीं छोडंनेवाले हैं! आप जोर लगायें, लगाते रहें, फिर भी पीछा न छोडेंगे, लगे रहेंगे!!

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