आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

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peetambara prashasti

पीताम्बरा प्रशस्ति

माँ पीताम्बरा

नास्ति का ही आदिकाल में, था सार्वदेशिक  प्रभुत्व
अस्ति भाव था कुम्हलाया, सृष्टि बीज में सुषुप्त
जीवन था नहीं कहीं, मात्र शैल और चट्टान
विकट स्थिति में ब्रह्मा ने, महाविष्णु  का किया आहवान !!1!!

महाविष्णु थे योगनिद्रा में, थी सोयीं लक्ष्मी चरणों के पास
क्षीर सागर था सुप्त-मंद, कहीं न जीवन आस
ब्रह्मा के करुण विलाप से, योगनिद्रा हुई भंग
प्रकट हुये महाविष्णु नाभि से, ब्रह्मा दिव्य कमल  के संग !!2!!

ब्रह्मा को महाविष्णु ने, किया अमोघ मंत्र प्रदान
ओम नमो नारायणाय का करो जाप, वैष्णवी शक्ति का हो संधान
बगुलामुखी हैं मेरी शक्ति, दस महाविद्या में आठवाँ स्थान
पीताम्बरा नाम से ख्यात, सृष्टि चक्र का देगी ज्ञान !!3!!

प्रार्थना की ब्रह्मा ने, परिक्रमा कर बार-बार
प्रभु करो मंत्र प्रकट, करुँ मैं जिसका उपचार
माँ पीताम्बरा समाहित आपमें, भजन का बता दो उपचार
अपने चरण रज से ब्रह्मा का, प्रभु करो शीघ्र उद्धार !!4!!

महाविष्णु के अधर पुट, मंद हास्य संग मिल गये
क्षीर सागर में सहसा, सहस्र कमल खिल गये
बोले प्रभु हो स्थिर करो, धारण धैर्य और शांति
अवचेतन से जुड़कर ही, द्रुतगति से मिटेगी भ्रांति !!5!!

ओम प्रणव संग ह्लीं देवी, प्रणव जपो वर्ष पर्यन्त
यम, नियम, आसन, प्राणायाम से सुषुप्ति दूर होगी तुरंत
आश्रय धारणा और प्रत्याहार का, माँ पीताम्बरा को करेगा प्रसन्न
पाँच वर्षों तक इनके अभ्यास से, फूटेगी पंच तत्व की किरण !!6!!

अचल वैष्णवी ध्यान रहे, बीते साधना का सातवाँ वर्ष
रोम-रोम में पुलक भरे, पसरे अन्तर्मन में हर्ष
अष्टांग योग निखरे अन्तस् में, माँ कुन्डलिनी हो जब प्रमुदित
सृष्टि सूर्य पूर्व दिशा में, हो जाय स्वत: उदित !!7!!

सप्त वर्षीय उपासना से, ब्रह्मा ने बनाये सप्त लोक
सांसारिक भोगों से, ‘भु:’ ‘भुव:’ और ‘स्व:’ का था संयोग
मह: और जन: अति पावन,  पवित्र आत्माओं का निवास
तप: लोक में देव ऋषियों का, सूक्ष्म भाव से वास !!8!!

सत्यम लोक देदीप्यमान, इश उपासकों से पवित्र
सृष्टि का ध्रुवतारा, उच्च भाव खचित चित्र
ब्रह्मा हुये संतुष्ट, दायित्व बोध से लबरेज
आत्म बल से समृद्ध, सबल विवेकी और सतेज !!9!!

आदर्श संयम और अनुशासन से, प्रत्येक लोक अनुप्राणित
क्रमिक जीव विकास यात्रा का, नियम हुआ प्रमाणित
जय-जयकार हुई ब्रह्मा की, घोषित हुये प्रथम प्रजापति
माँ पीताम्बरा की उपासना से, हुई प्राप्त यह ऊर्ध्व गति !!10!!

आनन्द अश्रु से भरे ब्रह्मा, दौड़ चले महाविष्णु के पास
चरण पर रख कर शीश बोले – प्रभु मैं आपका कृत दास
मानूँगा आपका आदेश, प्रकट करो पीताम्बरा मंत्र
जानूँ पर अन्यथा, सर पटक जीवन त्याग होगा तुरंत !!11!!

मुस्कुराकर  महाविष्णु ने, भरा ब्रह्मा को अंक में
कभी गिर सकते नहीं, अहं भाव के पंक में
तुम आदर्श कर्म योगी, जीव विकास हेतु संलग्न
गुप्त पीताम्बरा मंत्र प्रकटन, हेतु हूँ मैं अब बद्ध !!12!!

‘ॐ ह्लीं ‘ से प्रारम्भ कर, ‘बगलामुखी सर्वदुष्टानाम्’ का करो उच्चारण
फिर ‘वाचम् मुखम्  पदम् स्तम्भय्’ बोलकर, क्षणभर रोको दन्त
‘जिह्वाम् कीलय बुद्धिम् विनाशय’, शब्दों से  शोधित मारण
ह्लीं स्वाहा’ से हो पूर्ण, पावन स्तम्भक बगला मंत्र !!13!!

ब्रह्मा हुये अति प्रसन्न, माँ बगला को पाकर
मंत्र साक्षात् देव विग्रह, साधक के सूक्ष्म शरीर में समाकर
प्रजापति थे आदि साधक, कर्म भाव की करते उपासना
पीताम्बरा मंत्र कवच से होकर वेष्ठित, अधो भावों का करते सामना !!14!!

करुणा विगलित हुये प्रजापति, माँ पीताम्बरा का किया आहवान्
दर्शन दो माँ बगुलामुखी, आखिर मैं भी तेरी संतान
प्रणिपात हूँ कर रहा, स्व बलि हेतु तैयार
कृपा वृष्टि से नहलाओ मुझे, अन्यथा यह जीवन अस्वीकार !!15!!

भाव विगलन लगा बढ़ने, नदी का बढ़े  ज्यों जल आगार
नेत्र कटोरों से बहने लगा, अविरल तप्त अश्रुधार
सिद्धासन में बैठकर, स्व स्फुरित प्रजापति की साधना
सप्त वर्षों तक चलती रही, माँ पीताम्बरा की अखंड़ उपासना !!16!!

प्रसन्न हुईं माँ पीताम्बरा, ब्रह्माजी के तप से
साक्षात हुईं प्रत्यक्ष, तुष्ट मैं तेरे जप से
उठो पुत्र करो वरन, तप्त अधो लोकों का भार
तेरी अलौकिक साधना ने, चौदह भुवनों को किया तैयार !!17!!

ब्रह्माजी तो जमे रहे, कहीं न कोई तन संचार
स्वयं हो गये मंत्र रुप, शरीर का रहा न विचार
धन्य-धन्य माँ पीताम्बरा, धन्य तुम्हारा भक्त
जग रचना को है मुखर, जगन्माता पर आसक्त !!18!!

पुत्र भाव से जगन्माता की, आँचल का सुख पाकर
ब्रह्माजी हुये निहाल, सिद्धिदात्रि माता छाँव में जाकर
पुत्र सिद्धासन में है बैठा, अंक भर बैठी माता
दुर्लभ दैवी सुख यह, धन्य-धन्य हे विधाता  !!19!!

प्रमुदित माता ने पुत्र के, शीश पर रखे हाथ
धीर-धीरे लगीं सहलाने, स्नेह और ममता के साथ
प्रज्ञा चेतना लौटी वापस, ब्रह्मा हुये पुन: गेहस्थ
माँ दर्शन में अति विभोर, होने लगे वे स्वस्थ !!20!!

माता वर्षों से कर रहा, तेरा मैं इंतजार
आदित्य व्योम से रसातल तक, तेरा ही विस्सार
सात वर्षों तक मंत्र जाप, स्वयं होता रहा उच्चार
यह तो माँ तेरा ही, नूतन उल्लासपूर्ण चमत्कार !!21!!

भाव विगलन मेरा स्वीकार किया, मुझमें भक्ति का संचार किया
कुवृतियों पर प्रहार किया, आलस्य रिपु का संहार किया
रख ली भक्त की लाज,  रख ली उपासक की टेक
चौदह भुवनों के प्रजापति का, माता ने किया अभिषेक !!22!!

मैं तो भाव की रचना, तूने ही दिया मुझे आकार
जग उद्भव की मेरी कामना, तेरी कृपा से ही साकार
‘मैं नहीं कुछ’ ‘मेरा नहीं कुछ’, जुड़े हैं तुझसे तार
आत्म समर्पन भाव से, पाया परम जीवन का सार !!23!!

आगे भी तू, पीछे भी तू, अगल-बगल भी तू ही
‘मैं’ ‘मैं’ निकले तो भ्रमवश, अज्ञानता से यूँ ही
उपर भी तू नीचे भी तू, तुझसे पाये पार न कोई
घमंड जरा भी किया किसी ने, तत्क्षण सारी सम्पदा खोई !!24!!

योगमाया तुम्ही, चतुरता से संचालित करती विश्व
स्वर व्यन्जन भी तुम्हारी रचना, मात्रायें दीर्घ हो या हृस्व
तेजपुंज माँ रश्मियुत हो, हो द्वादश आदित्य
दिक दिगन्त में व्यापक माता, धन्य तुम्हारे कृत्य !!25!!

तेरे चरणों पर गिरा पड़ा मैं, माँ सस्नेह उठाओ
मद वर्षा में कभी न भिंगूँ, ऐसा उपाय रचाओ
रहूँ तुमसे जुड़ा सदा, भक्ति का ऐसा रंग रचा दो
आग्रह विनय यही है तुमसे, हर कोशे में विश्वास बसा दो !!26!!

निस्पृह भाव से करती सदा, जग का तुम कल्याण
अन्य क्षेत्र करो उत्पन्न, जीवों के गत हो रहे प्राण
मातृ भाव से करती रहो, समस्त संसार का पालन
आपेक्षिक भाव से यह सृष्टि भी, रखे तुममें अपना मन !!27!!

माँ पीताम्बरा नित्य तुम्हीं हो, तुम सदैव अदृश्य
जीव कार्यवश होती प्रकट, स्थूल भाव है मात्र पृष्ठ
तेरे होने से विवेक बुद्धि, और औचित्य का विचार
अनुभव तुम्ही अनुभूत तुम्ही, विनय यही शत् बार !!28!!

असुर मधु और कैटभ का, मर्दन किया तूने गत गुरुवार
विष्णु कर्ण मैल से उत्पन्न, दानव कर ही देते मेरा संहार
मूक और जड़ था मैं, भय से था गात आक्रांत
मुक्ति उनसे दिलायी तूने, मन मेरा हुआ अब शांत !!29!!

तुम स्वाहा हो माँ पीताम्बरा, सुधा भी हो तुम ही
वषट्कार हो सुर लहरी हो, विरल सुधा भी तुम ही
ईश्वरवाची हो प्रणव तुम, ‘अकार’ ‘उकार’ और ‘मकार’
अव्याख्येय अर्धमात्रा बिंदु से, जग का करतीं उद्धार  !!30!!

माँ बगले ! तुम हो संध्या हो, सूर्य शक्ति सावित्री
धन्य भक्त वह करे धारण जो, पीताम्बरा नाम की पवित्री
विश्व प्रसूता माता पीताम्बरा, उत्पन्न तुझसे यह संसार
मैं तो माँ बस प्रतिनिधि हूँ, है तेरा ही विश्व रुपी घर बार  !!31!!

धारणा तुम्हारी करुँ हमेशा, ध्यान भी अब तुम्हारा
मांस मज्जा में स्नायु कोश में, हो व्याप्त पीताम्बरा रस धारा
जागूँ चाहे सो जाऊँ, फिर भी भूलुँ नहीं तुम्हें एकपल
डिगूँ नहीं कर्तव्य पथ से, गर ड़राये असंख्य रिपु दल !!32!!

कर्तव्य पथ पर हे जननी ! मैं सहर्ष बलि चढ़ जाऊँ
अस्तित्व की मिटे भ्रामक आस्था, गर्व से अस्तित्वहीन कहलाऊँ
क्या हर्ज है बेनामी में, संसार में अवशिष्ट पूजा भाग पाऊँ
परमेश्वरी गोद में बैठा, ध्यान पुष्प माता पर चढ़ाऊँ !!33!!

साधना साधक और साध्य, त्रिभुज हर काल में है सफल
निम्न भाव से उच्च भाव, गमन होता रहता प्रतिपल
चाहिये सिर्फ स्थिरता रुप, स्तम्भन पीताम्बरा साधन से होता हल
अष्टांग योग खिलाये अन्तस कमल, ईश सायुज्य हो सरल !!34!!

जीवन क्या है समझूँ इसको, झरने सा झर जाऊँ
यम नियम के झाड़ू से हर, कुवृति मार भगाऊँ
सकारात्मक सोंच का पोंछा, प्रतिदिन अपने अंदर लगाऊँ
यह न होगा कभी न बोलूँ, दैन्य पर्वत को मिटाऊँ !!35!!

माँ पीताम्बरा वर दो मुझे, कट्टर पंथियों से टकराऊँ
धर्म के घृणित व्यवसाय को, तुरंत ही तोड़ गिराऊँ
जहाँ-जहाँ पाखंड बसे, बटुक भैरव का मुसल बरसाऊँ
भाव कचरे को साफ करुँ, तब ही तो ब्रह्मा कहलाऊँ !!36!!

तेरी शक्ति मेरे भीतर, तु  विष्णु की है शक्ति
महाविष्णु हैं रमते मुझमें, अपार है मेरी भक्ति
माँ लक्ष्मी को मना लिया, फिर तेरे पकड़े पाँव
माँ पीताम्बरा दे दे अब तो, मातृत्व की ठण्ढ़ी छाँव !!37!!

अब रोकेगा कौन मुझे, मेरे साथ है माता
निर्माण की इस नैया का, खेवनहार स्वयं विधाता
देना सीखा तो मलय पवन भी, देगा अवश्य अपनी सुगन्ध
श्रम पसीने की बूदें भी गायेंगी, हँस के छन्द !!38!!

वरुण आये थे मिलने को, लेकर अमृत कलश
भीनी-भीनी थी खुशबू, भरा था रस ही रस
उलट दिया कलश को मैंने, ब्रह्म लोक में सुधा बहायी
पारिजात वृक्ष ने अमृत छका, ली एक मीठी अंगड़ाई !!39!!

सुधा सिंचित हो पारिजात ने, उपजाये अमृत फल
सहस्त्र खग तुरत आ पहुँचे, बनाकर अपने दल
मैंने कहा हे पक्षीगण ! हो नहीं निराश
ऐसे अनगिन अमृत कलश हैं, वरुण देव के पास !!40!!

आवश्यकता है सिर्फ इतनी, श्रम महत्व को जानो
पक्षी हो या हो मानव, अपने अन्तस् को पहचानो
सृष्टि का आरम्भ अभी, सभी जीवों के पास बुद्धि
विवेक का प्रयोग करो, कर लो तत्व की शुद्धि !!41!!

सच है जो भी जागे जिस क्षण, उस क्षण ही जीवन प्रभात
आलस्य भाव छटके तत्क्षण, जागृति की मिले सौगात
कोई हर्ज नहीं कल तक सोया, उच्च भाव रहे अनुपलब्ध
शौर्य पताका फहरेगी ऐसी, रह जायेंगे सभी स्तब्ध !!42!!

आत्म प्रचार का यह कैसा झोंका, भूला माँ का यशोगान
माँ ने ही की विश्व रचना, सतत् रहे मुझे इसका भान
भाव उसी के छन्द उसी के, उसकी ही है वाणी
मैं भी तो उसका ही, सृष्टि की प्रथम कहानी !!43!!

हे माँ ! व्याप्त पूरे जीवन में, क्षुधा व्याधि और पिपासा
मुमुक्षों जनों को भला क्योंकर, भाव समाधि की आशा
पाप पलते भूख के कीड़ों में, अन्न ही प्राण बचाता
इसीलिये पुत्रों को हरदम, रास आती केवल माता !!44!!

बीजों को सड़ने से, भला है कौन बचाता
कृषक मानव के खेतों में, फसल कौन लहराता
कौन है वह करता जो, समयानुरुप ऋतु सृष्टि
समय पर उगाये धूप, ससमय करे वृष्टि !!45!!

माँ पीताम्बरा की कृपा ही, बीजों को सड़न से बचाता
मातृ कृपा की छाँह में कृषक, खूब फसल उपजाता
धूप पीताम्बरा शीत पीताम्बरा, पीताम्बरा ही है वर्षा
माँ पीताम्बरा की कृपा से देखो, कपास पुष्प भी हर्षाता !!46!!

माँ  की विचित्र माया लीला, मोहित समस्त जगत
खल शठ हो या कामी, अथवा पहुँचा हुआ भगत
‘मैं’ की है ऐसी रचना, मुश्किल है पीछा छुड़ाना
माँ पीताम्बरा रक्षा करतीं, इनकी शरण ही आना !!47!!

माँ पीताम्बरा नित्य स्वरुपा, जगत इनका ही रुप
दृश्य श्रव्य और परा शक्तियाँ, अनगिन अकथ अनूप
नाना भावों में विचरन करतीं, कण-कण में पीताम्बरा संचार
इष्ट भजन की सिद्धि हेतु भी, मेरी माँ ही हैं उपचार !!48!!

महाप्रलय होने पर महाविष्णु, क्षीर सागर में सो जाते
शेषनाग की शय्या बिछाकर, चैन की बंसी बजाते
उस समय भी माँ पीताम्बरा ही, है रहती क्रियाशील
वैष्णवी शक्ति ही करती, महाविष्णु को शिथिल !!49!!

नये कल्प की ससमय सृष्टि, करती पुन: योगमाया
सृष्टि बीज चुन चुन बिखराती, चतुर्दश भुवन फिर हर्षाया
दोनों अतियों की एकमेव आश्रय, महाविष्णु की शक्ति
धन्य पीताम्बरा धन्य माँ बगले,  दो तुम मुझे अपनी भक्ति !!50!!

माँ पीताम्बरा की कृपा से, दृश्य जगत की सत्ता
वे हीं देती श्रमानुरुप वेतन, और विविध भत्ता
कर्मानुरुप पाते यहाँ सब, माँ कृपा सबके लिए समान
दैवी भाव से अतृप्ति, है मात्र मानव अज्ञान !!51!!

अग्नि भी तुम यज्ञकुण्ड़ तुम ही, तुम ही हो घृत
तुम्हें जान लेने पर श्री माता, हो सके कोई न मृत
काम तुम्हीं और क्रोध भी तुम ही, हो तुम मोह और लोभ
लज्जा घृणा मात्सर्य भी तुम, हो तुम ही मद और क्षोभ !!52!!

कहता हूँ मैं हाथ जोड, तुम महाविद्या हो माता
सारे भाव हैं तुम्हारे, तुम अधो उर्ध्व की ज्ञाता
महामाया तुम महासुधि तुम, और तुम्हीं महामेधा
यज्ञ याज्ञिक कुण्ड पुरोहित घृत राल और समिधा  !!53!!

माँ ने की विश्व रचना जब, गुरु को गईं भूल
निर्गुण निराकार अजन्मा, स्व भाव में गईं झूल
घबराया मैं बहुत, बड़े लोगों की बड़ी है बात
गुण न मिले तो निभाऊँगा कैसे, स्पृह विसोचना का साथ !!54!!

मैंने पकड़े माँ पीताम्बरा के चरण, आँसुओं से धो ड़ाला
बोला माँ यह कैसी लीला, गुणों को मार गया क्यों पाला
जब गुण ही न होंगे तब होगी कैसे, कोई भी बुरी भली क्रिया
इससे अच्छा था न देतीं यह रचना, व्याप्त हो चुकी है अक्रिया !!55!!

माता ने देखा गहरी दृष्टि से, नाराजगी का थोडा आभास
भ्रुमध्य को किया संकुचित, मुख से निकला अट्टहास
बोलीं धैर्य करो धारण, तुम कैसे प्रजापति ?
बात बात में मत घबराओ, भ्रमित हो जायेगी मति !!56!!

लो देती हूँ तीन गुणों को, सत रज तम विमुक्त
लेकिन तीन दिनों तक रहना होगा, ब्रह्मा तुम्हें अमुक्त
तेरी साँसें गुणों में भींगे, फिर गुण होंगे संसार
यह पारमार्थिक वायुपूरन, तदनन्तर गुण सृजन को तैयार !!57!!

सत्व गुण से वेष्ठित होंगे, साधु और यति
रजोगुणी होंगे संसारी मर्यादित, उनकी मध्य गति
तमोगुणी भोग पंक में डूबें, करें पूर्ण जीवन चक्र
भोग पूर्ण होने पर पायेंगे, धवल सत का वक्र !!58!!

निर्गुणीं होंगे स्थितप्रज्ञ, उनका सदा ही मान
चाहे कुछ भी हो जाये, एकनिष्ठ ज्ञानी का सदा कल्याण
अभय दान देते पूरे ब्रह्माण्ड़ को, शामिल उसमें गगन
सभी वेषों में पाये जाते, खुद में ही करते वे रमण !!59!!

मेरी रचना मैं हीं जानूँ, और न जाने कोई
शक्तिवानों ने मद में चूर हो, अपनी शक्ति खोई
बनो धीरमति करो गुणों का, निर्मल मन से भोग
हर हाल में रखना स्व को तुष्ट, न होगा कोई रोग !!60!!

अंधकार ही सत्य है, जाना है जिसने यह तथ्य गुढ़
सृष्टि रहस्य पहुँचे उस तक, तम भावों से भरपूर
शैथिल्य निराशा और अक्रिया की, है तिकडी तगडी
अधोभाव में जो रमा, बचेगी उसकी ही पगडी !!61!!

संसारी जन होंगे हैरान, यह भला कैसी बात ?
शास्त्रों ने है सिखलाया, मत दो अधोभावों का साथ
यहाँ कह रही माता स्वयं, निम्न भावों को अपना बना लो
फिर कैसे बचेगी मर्यादा?, हे पीताम्बरा! यह तो बता दो !!62!!

उल्टी गंगा बहाऊँ मैं तो, जानो हे ब्रह्मा सुजान
अध्यात्म रथ है अति विचित्र, तुम अभी इससे अनजान
तम सृष्टि है अंधभावों का, जीवन द्वार पर पहरा
इस निर्माल्य को करो धारण प्रजापति, खुलेगा जीवन पृष्ठ सुनहरा !!63!!

यह नही कहती, गंदे विचारों में रमे रह जाओ
आग्रह यही है, भाव धूर्तता के फंदे सुलझाओ
जबतक बसी रहेगी तुम में, उच्च भावों की रटना
निश्चित जानों जन्म जन्मांतर में, होगा भटकना !!64!!

कोई बोले झूठ तुमसे, दे गच्चे पर गच्चा
विमूढ़ बने रहोगे कब तक, बुरा है या अच्छा
तम भेदकर अधोभावों को, अन्तर्मन से उलीचो
प्राणवायू को प्राणायाम से, सुषुम्ना नाडी में खींचो !!65!!

सप्तचक्र को जानो, मेरुदंड़ के भीतर जो स्थित
ऊर्ध्व श्वेत जाग्रत किरण दंड़, सुषुम्ना में है अवस्थित
मूलाधार है प्रथम कुन्डलिनी चक्र, लिपटी पडी मैं महामाया
मूलसर्पिनि विश्वशोधिनी, क्षण में बदल दूँ काया !!66!!

हूँ गुदामार्ग की आधारशक्ति, जाने जिसे न संसार
ब्रह्मविद्या का मूल यहाँ, समस्त सृजन का आधार
सप्तचक्र में प्रथम कमल, हैं चार अर्ध पुष्पित दल
‘वं’ ‘शं’ ‘षं’ ‘सं’ बीजमंत्रों से वेष्ठित, मूलाधार का बिल्व फल !!67!!

अन्य चक्रों की अभी नहीं जरुरत, जगाओ पहले मूलाधार
अष्टपाश और छह रिपुओं का, होने दो संहार
स्वादिष्ठान और मणिपूरक का, ज्ञान मैं तुम्हें दूँगी
सूर्यग्रन्थि का भेदन कर, ऊर्ध्व यात्रा तेरी स्वीकार कर लूँगी !!68!!

माँ की बातें खुले मन से, मैं प्रजापति करता स्वीकार
थोडी अब कर लूँ स्तुति, माँ पीताम्बरा की महिमा अपरम्पार
कालरात्रि और महारात्रि का, मोहरात्रि में है निवेश
प्राकृतिक वैकृतिक और मुक्ति रहस्य, ख्यात अध्यात्म जगत में विशेष !!69!!

माँ पीताम्बरा हो तुम लज्जा, पुष्टि और सर्वतुष्टि
शूलधारिणी खड्गधारिणी, तुमसे ही मेरी संतुष्टि
माँ तुम हो घोररुपा, करती चक्र और गदाधारण
शंख धनुष बाण और भुशुण्डि से, करतीं अरिदल संहारन !!70!!

परिघ गोलों की अतिउच्च मारण क्षमता, अति आधुनिक तेरे अस्त्र-शस्त्र
महाभयंकरा हो तुम माता, धारण करतीं पीत वस्त्र
तुम सौम्या हो मोहक भी तुम, हो तुम अति सुंदर
तेरे समक्ष झुकें इन्द्र वरुण, और शिवभक्त दसकन्धर !!71!!

एक तरफ हो अति कठोर, दूसरी ओर हो परम उदार
विरोधाभास नहीं कहीं, यह समग्र जीवन आचार
अच्छे बुरे का विभाजन मिथ्या, सबकुछ की जननी माता
दिक् काल स्थिति अनुसार बरततीं, सबकुछ से है नाता !!72!!

हर देव देवी के पूजन का, होता निश्चित विधान
भिन्न-भिन्न हैं पूजा विधियाँ, भिन्न-भिन्न हैं ध्यान
शास्त्र वर्णित पीताम्बरा स्वरुप का, करता हूँ उल्लेख
त्रुटि क्षमा करें सभी जन, मुझ अपात्र को देख !!73!!

सुधा समुद्र के मध्य, मणिमय मण्डप है स्थापित
दिव्य सिंहासन रखा है, अनमोल रत्नों से उत्थापित
पीत पस्त्र पीत आभूषण, और पीत पुष्पों की माला
माँ  पीताम्बरा अवतरण हेतु, विधि ने अद्भुत दृश्य है रच डाला !!74!!

मेरी माता हैं शक्तिपुंज, न हुईं कभी पराजित
शौर्य भाव से सिंहासन पर, चपलता संग विराजित
दो ही कर हैं और चरण दो, मोहक है त्रिनेत्र
द्विति गति भाव अति शोभित, अलौकिक पीताम्बरा क्षेत्र !!75!!

बायें हाथ में माता ने, असुर की खींच रखी है जीभ
बायाँ घुटना है मुडा, रक्त वमन हो रहा अतीव
उठे हुये दायें हाथ में, शोभित मुद्गर रुप गदा
दायाँ पैर है तिरछा अड़ा, आक्रामक भाव सदा !!76!!

माता पीताम्बरा हैं प्रभुजनों, स्तम्भन शक्ति हेतु विख्यात
समस्त पिंड़ों की अचल स्थिति, माँ पीताम्बरा के साथ
शत्रुविनाश हेतु संसारी जन, करते इनकी साधना
अध्यात्म क्षेत्र में स्वरिपु समनार्थ, होती इनकी उपासना !!77!!

आत्म स्वरुप पर माता करतीं, गगन का निर्माण
आत्म स्वरुपा बुद्धि वृत्ति में, माँ पीताम्बरा का स्थान
माँ पीताम्बरा ही अष्टवसु हैं, और एकादश रुद्र
गणनीय पंचीकृत महाभूत संग, अपंचीकृत महाभूत शुद्ध !!78!!

वेद है माता ऋषिगणों की, असुरों की अवेद
साधकों की विद्या ये ही, ये ही श्रम श्वेद
देवदूत हो मानव दल हो, या फिर राक्षस यातुधान
सब जीते माँ पीताम्बरा कृपा से, माँ करती जीवन दान !! 79!!

अनाहत चक्र के कमल दलों पर, माँ शीघ्र विजय दिलाओ
सम्बन्धों को मैंने निभा लिया, अब तो मुझको अपनाओ
मुक्ति चाहूँ कहलाऊँ मुमुक्षु, मन में वैराग्य निभाऊँ
बरतूँ इस संसार में ही, वन क्षेत्र क्यूँ कर मैं जाऊँ !!80!!

सब साधन चूक जाने पर प्राणी, तेरी शरण में आता
संसार गणित में फिर भी उलझा, साधक वेश सजाता
हाथ जोड चिल्लाये माँ माँ, घडियाली आँसू बहाये
तुरत पलटे भाव अगर, सोने का छोटा टुकडा भी दिख जाये !!81!!

गुलाल मिश्रित सुगन्धित जल से, रोज शरीर को नहलाये
मंदिर जाये शाम सबेरे, महँगी पूजा थाल चढ़ाये
महँगे वस्त्राभूषण से परिजनों को उपकृत करे,वायुयान की सैर कराये
न्यासी बनकर कम्बल बाँटे, जनसेवक कहलाये  !!82!!

संयोग इस धनपति के घर, कोई याचक गर आये
नौकर बोले आकर तो, अंदर से ही फटकार लगाये
याचना कैसी याचक है कौन, सब कोई तो अपने
ऐसे विचार आयेंगे क्यूँकर, देखे सिर्फ मानवता के सपने !!83!!

देखो कैसा दोहरा जीवन, हर पल ये हैं जीते
दिन को छाछ दूध और मट्ठा, रात को मदिरा पीते
सूर्य प्रखर तो दानी हैं ये, रात को हो जाते कामी
मद का नशा बढ़े शाम ढ़ले, पत्नी रो रो पुकारे स्वामी !!84!!

इसीलिये कहता हूँ माता, अब मत दिखाओ मुझे यह नाटक
मूलाधार में ही मैंने देख लिया है, वैराग्य का अनाहत फाटक
ढ़ाई वर्षों से ले रही परीक्षा, अब तो करो समीक्षा
डालो हर्षित हो झोली में मेरे, वैराग्य भक्ति और तितिक्षा !!85!!

हर उपलब्धि से बडी है, शांति और संतुष्टि
माँ पीताम्बरा ही करेंगी, मुझमें इसकी सम्पुष्टि
मन हो शांत उलझन नहीं कोई, फिर कम में काम चलेगा
घृत दधि मेवा नहीं मिले तो, कैसा भी भोजन पकेगा !!86!!

तृप्ति भी हैं माँ पीताम्बरा ही, इसे न भूल जाना
और और की चाहत में, मेरी मैया को नहीं रुलाना
ममतामयी माता ने पुचकारा, मिला मुझे अनचाहा
ध्यान धारणा किया कुछ नहीं, बुरी आदतें हो गई स्वाहा !!87!!

सुन साक्षनी हो तुम माता, हो चिन्मय आनन्द
तुझसे बढ़कर है नहीं कुछ, देतीं शाश्वत परमानन्द
हर पल में आनन्द की वर्षा, रोम रोम पुलक जाये
ऐसी सिद्धि मिले क्षणों में, आँखों को बरबस छलकाये !!88!!

भोग मिले योग मिले, मिले इस जग में नवजीवन
समर्थ नहीं पर सभी मुमुक्षु, सुलभ नहीं भक्ति का सेवन
यह रस है ऐसा नौसागर, वातावरण में घुलमिल जाये
जिसकी है उसे मिले ही, जग उपवन को हरसाये !!89!!

अहंकार ही असली शत्रु, जितनी जल्दी यह गल जाये
साधना पथ हो कंटकमुक्त, नफरत शैल भी पिघल जाये
समष्टि चिंतन में हो रत मन, व्यष्टि रति तुरत जल जाये
औरों का सुख लगने लगे अपना, मानव क्षण में बदल जाये !!90!!

मुझे ज्ञात है माता ही हैं, संसार का आदिकारण
परम माया हैं रचती माया, स्वयं करती माया निवारण
खुद भरती नास्तिक भाव, खुद आस्था के फूल खिलाती
मोह माया के छन्द रचती, खुद ही वैराग्य बढ़ाती !!91!!
भ्रम है पसरा समस्त विश्व में, विचारों की है मारामारी
जो पत्थर पूजित एक जगह, अन्यत्र फेंकने की तैयारी
एक साधु पूजित स्व मठ में, कहीं और मिले न ठौर
एक राज्य का नृपति देखो, बन्दी बन निकले बासी कौर !!92!!

समिधा लकड़ी पडी कुटीर में, आये कहाँ से ज्वाला
चकमक पत्थर भी कहीं नहीं, सिर्फ चीनी मिट्टी का दो प्याला
माँ पीताम्बरा का नाम जपा, प्यालों को मिनट भर रगड़ा
अग्निदेव प्रकट हुये, खत्म हुआ मन का सारा झगड़ा !!93!!

जीवन ही है महत्त साधना, छोड़ो ऊँची बातें करना
स्व अनुभव से ढ़ले चलो, ठूँठ बने रहोगे वरना
हर जगह की माता स्वामिनी, हो उनकी ही क्षत्रछाया में
आत्म समर्पन करो सभक्ति, अन्यथा भूले रहोगे उनकी माया में !!94!!

सभी नारियाँ इस जगत में, माँ पीताम्बरा की प्रतिमूर्ति
अधोभाव से देखो मत, करनी होंगी महँगी क्षतिपूर्ति
नारी का सम्मान जहाँ, सुख शांति की ही बात
बिना ज्यादा हैरत के, समस्त उपलब्धि आये साथ !!95!!

पीताम्बरा भाव से समग्र सृष्टि, समष्टि रुप से आच्छादित
आत्मानुरागी ऋषिजनों ने, इस सत्य को किया उदघाटित
बाहर सदृश रचना अंदर की, उपलब्ध समस्त संसाधन
निम्न वृतियों से तनिक विलग हों, कर लो  पीताम्बरा आराधन !!96!!

जीवन का है चरम लक्ष्य, स्व से साक्षात्कार
ईश सायुज्य हो उस क्षण, विजित जब सहस्त्रार
कर्मकाण्ड हो हो प्रार्थनाएँ, कोई भी अन्य साधना
हर रुप में लोग कर रहे,  माँ पीताम्बरा की ही उपासना !!97!!

हे प्राणी! माँ का भजन करो, हर दिन हर काल
चिन्ताहरण यंत्र तो खुद देती माता, क्यूँ हो रहे बेहाल
देश का बनता प्रधान, माँ कृपा से गुदड़ी का लाल
स्वर्णिम भविष्य बने पल भर में, मेरी माँ का यह कमाल !!98!!

माँ पीताम्बरा सर्वव्यापिनी, तेज ओज की हैं खान
देह स्नायु वर्णरहित को, शुद्ध चमत्कारिनी मान
हैं कवयित्री सर्जक स्व भूता, माता परम मनस्वी
सर्वजयी हैं कला प्रवीणा, और चरम तेजस्वी !!99!!

शक्तिरुपा माँ पीताम्बरा की, अद्भुत स्तम्भन शक्ति
वर्षों से सूखी धरती पर, निमित मात्र में हो जाये वृष्टि
माँ पीताम्बरा की महत्ती कृपा से, आदित्य मंडल व्योम में है ठहरा
स्तम्भन रहित हो ढ़ह जाये, ब्रह्मा कर लें चाहे प्रयास प्रखर तगड़ा !!100!!

सत्य युग के द्वितीय चरण की, सुनो दारुण व्यथा कथा
हाहाकारी तुफान आया, जानमाल का कोई नहीं पता
मरने लगे विविध उत्पातों से, सम्पूर्ण जगत के प्राणी
न बचा एक भी साधक, और न कोई ज्ञानी !!101!!

पालनकर्त्ता को अखड़ गया, जीवों का जीवन संकट
तत्क्षण महाविष्णु ने किये प्रेषित, दो विस्वस्थ सुभट
जाओ अनुचरों तत्क्षण पृथ्वी पर, स्थिति को संभालो
दिक्कत अगर हो कोई, मुझे उसी क्षण बुला लो !!102!!

शामल वैकट अनुचर पुराने, हो गये वरुण विमान से रवाना
‘ऊँ’ दण्ड लिये हाथ में, छू लिया प्रशांत मुहाना
चक्रवात ने प्रभु विमान को, पल भर में ऐसा तोड़ा
दोनों संगी पड़े फेर में, ‘ऊँ’ दण्ड से विमान को जोड़ा !!103!!

हड्डियों का सर्वत्र ढ़ेर था, और असह्य दुर्गन्ध
कहीं कोई न पशु पक्षी था, मानव थे महज चन्द
महाविष्णु सेवक परमबली थे, देवी प्रणव ‘ह्लीं‘ का किया प्रयोग
अपेक्षित परिणाम निकला तत्क्षण, चक्रवात पर लगा रोक !!104!!

यह तात्कालिक शमन था, दोनों पहुँचे वापस विष्णुधाम
हाथ जोड़ की विनय, अब प्रभु यह आप का ही काम
बुलाइये वैष्णवी शक्ति, हम भी माँ पीताम्बरा को करें प्रणाम
आज से ही होगा प्रारम्भ, माँ पीताम्बरा जाप का अष्ट याम !!105!!

महाविष्णु ने गम्भीर मुख मुद्रा से, जारी किया आदेश
पृथ्वी पर सौराष्ट्र क्षेत्र में, भेजो तुरंत संदेश
हर चौराहे पर ॐ दण्ड हो, फहरे ॐ पताका
आ गया मैं तप करने, ध्यान पीताम्बरा माँ का !!106!!

मातृ भाव से सविधि पूजा, महाविष्णु ने अपनी ही शक्ति को
हरिद्रा सरोवर धन्य हुई, जग सराहे महाविष्णु की भक्ति को
महाविष्णु की नम्रता से, निकला नया प्रभात
माँ पीताम्बरा की स्तम्भन शक्ति से, रुका तुरत चक्रवात !!107!!

लो गुरुवर है तुम्हें ही अर्पण, यह नई अभिनव मधुशाला
माँ पीताम्बरा की महती कृपा से, भेंट तुम्हें अष्टोत्तरशत पुस्तकों की माला
तुम्हारी रचना तुम ही जानो, मुझे लाभ ही लाभ
बिना श्रम के सधी साधना, कटे जन्मों के श्राप !!108!!

Rohini-pati-singh-oyomesh

Rohini pati singh 'Vyomesh'


ऊँ सद्गुरुदेव परमहंसाय नम:
ऊँ अखिलानन्दाय नम:

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