आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

ताज की थी फीक्र किसे

वज्रगृह की मोटी बेड़ी ने
बेधा देह बना अंतस् हाला
परतंत्रता की कसक से कवि ने
पी ड़ाला प्याले पर प्याला

ताज की थी फीक्र किसे
खाक छानता चला आया

रंग पड़ गये सारे जब फीके
चमक उठी कवि की मधुशाला

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