आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

sansar aur adhyatma

इस संसार में ही रहकर अध्यात्म पुष्ट होता है

अत: अपने संसार को भी पुष्ट करते हुये बढ़ते चलें

अत: संसार व  अध्यात्म  एक-दूसरे के  प्रगति में पूरक व सहायक हों

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