आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

sadhak ka kartavya

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“गुरु शरण” कुकर्मों के फल की तीव्रता और आघात के संवेग को नियंत्रित अवश्य करता है किन्तु खत्म नहीं करता । अतएव जाने-अनजाने बुरे कर्मों से बचने के लिए सतत् प्रयत्न करते रहना ही साधकों का कर्तव्य होना चाहिये – डा॰ शंकरानन्द मिश्र “शास्त्री”

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One thought on “sadhak ka kartavya

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