आनन्दधारा आध्यात्मिक मंच एवं वार्षिक पत्रिका

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्द:खभाग्भवेत्

saptalok

भू: भूव: स्व: मह: जन: तप: सत्यम् मन इन सप्त लोकों में विचरण करता है। मन जब इन लोकों से उपर उठता है तभी अध्यात्म की वास्तविक कहानी/प्रक्रिया शुरु होती है। प्राय: सांसारिक मन भू: [लिंग, मूलाधार], भूव: [गुदा, स्वादिष्ठान] व स्व: [नाभि, मणिपूरक] इन लोकों में ही भ्रमण करता है। मन को इन लोकों से क्रमश: उपर उठना चाहिये। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया क्रमश: मन को इन लोकों से उपर उठाता है । साधक की मन:स्थिति इन लोकों को भेदकर उपर उठने की होनी चाहिये। साथ ही साथ इन चक्रों को विजीत कर आगे उपर उठना चाहिये। साथ ही साथ मूलाधार पर पूर्ण नियंत्रण होनी चाहिये, कारण कुण्डलिनी का निवास यही है।

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