Archive for February, 2012


गुरु शिष्य का सम्बन्ध एक-दूसरे को भव-सागर पार करने के लिये होता है! समय के मार से अगर कोई गुरु अपने शिष्य को बचाता है, तब इसके पीछे एक शुभता छिपी रहती जो शिष्य को अपने सद् मार्ग पर निर्भीकता से बढ़ने के लिये प्रबल साहस प्रदान करता है! इसके विपरीत अगर कोई विमूढ़ अपने आप को दंभ का भंड़ार बना ले तथा अपने गुरु के पीछे उन्हीं को निरुत्साहित करने लग जाये, सम्बन्धों को धन से तौलने लग जाये, यह शिष्य को गर्त में ले जाने का सहज रास्ता बन जाता है!

हर किसी नजदीकी  के मार्ग की प्रगति को अपने प्रगति में बाधा के रुप में लेने लग जाये, किसी से किसी को अगर मिला दे उसकी कीमत लेने  व लगाने लगे, बात न बने तब एक-दूसरे के खिलाफ आग उगलने लगे,  जब कोई भी ऐसा काम न होने पाये तब अन्त में गुरु को ही समाज में सबसे पीछे, गिरा हुआ, दलित के रुप में देखने, और दिखाने लगे, यह शिष्य के प्रतिभा की कमी को इंगित करता है!

गुरु अगर शिष्य को दंडित नहीं करते हैं, तब यह अहोभाग्य नहीं वरन् शिष्य के लिये दुर्भाग्य हीं है! वह अपने हर कृत्य के साथ गुरु से दूरी को बढ़ाता जा रहा है! जहाँ लोग सच्चे गुरु की तलाश में भटकते रहते हैं, वहीं कुछ लोग अपने सौभाग्य को झूठे अहंकार, मान-मर्यादा और अयोग्यता के समक्ष गुरु को ही तुच्छ समझने की भूल कर बैठते हैं!

किसी के परिवार में कलह की स्थिति पैदा करके कोई कितने दिन तक जीवन की सहज अवस्था को बरकरार रख सकते हैं, भले ही महान गुरु शिष्य के ऐसे कृत्य को दरकिनार करते रहें, अपने उपर लेते रहें!

 

“वाकदन्डं प्रथम दन्डं” – अभी के लिये इतना ही काफी है, अगर आगे ऐसे हीं करते रहें, तब आपकी काफी क्षति उठानी पर सकती है! अब भी समय है! समय रहते गुरु के प्रति अपने निकृष्ट  रवैये को सुधार लो! गुरु जब आपको आगे बढ़ने में सहायक रहे हैं, तब उन्हें पीछे न धकेलो! ईश्वर के प्रकोप से बचो! गुरु ईश्वर के दुलारे होते हैं! वे कब तक अपने दुलारे के अपमान को बर्दाश्त करेंगे! इसके पहले कुछ अनहोनी हो जाये,  अपने नकारात्मक रवैये को बदल लो! गुरु के प्रति श्रद्धा करना सीखो! आगे से यह बताने के लिये भी कोई आगे न आएगा! अभी भी समय है, दोहरे, खोखले मान-सम्मान के परिधि से बाहर आ जाओ! गुरु क्षमाशील होते हैं! बच्चा संभल जाओ! समझ जाओ!!

अभिनव मधुशाला -३५

अभिनव मधुशाला -३५

भगवान विष्णु

भगवान विष्णु

शांताकारं भुजगशयनम्  पद्मनाभं सुरेशं!

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगं!!

लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिर्भिध्यानगम्यं!

वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथं !!

अभिनव मधुशाला - ३४

अभिनव मधुशाला - ३४

अभिनव मधुशाला - ३३

अभिनव मधुशाला - ३३

हम विचारों के भँवर में पड़े रहते हैं!  एक पर एक विचार बिन बुलाये मेहमान की तरह बिना दस्तक दिये आते चले जाते हैं! इससे हमारा कल्याण तो होता नहीं, वरन् और हम अपने लक्ष्य से दूर होते चले जाते हैं! किसी महापुरुष ने कहा है कि अगर आप कुआँ खोदने चाहते हैं तब एक ही जगह विचार कर पूरी खुदाई करें, सफलता हाथ लगती है! इसी तरह विचारों के भाग-दौड़ मनुष्य को दिशा अवश्य देते हैं, पर स्थायित्व में गड़बड़ी मचा देते हैं! आप एक विचार को अपने अन्दर उतार लें, तब आपमें आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी व लक्ष्य के प्रति अधिक ऊर्जा आनी शुरु हो जायेगी! विचारों के अनचाहे प्रवाह को अपने योग्यता/स्वभाव के अनुरुप दूर धकेल दें! आप अपने आजमाये तरीके से उसे निरस्त करते चलें! विचारवान होना अच्छी बात है, पर यह विचारों का अनावश्यक प्रवेश काफी अहितकर है खासकर कि तब जब आप स्थायित्व की तरफ कदम बढ़ा रहे हों! इसके संयम से आप अपने लक्ष्य के प्रति अधिक समर्पित और जागरुक व सफल रहेंगे!

जीवन में आगे बढ़ते हुये, आत्मिक संतुष्टि को बरकरार रखना भी साधना की सफलता को ही इंगित करता है! यदि यह संतुष्टि कहीं खोई सी प्रतीत हो रही है तब शायद उस मार्ग का अनुगमन कर रहे हैं जो आपके अनुरुप नही है या त्रुटि की पूर्ण संभावना है! जब कभी ऐसा लगे, जीवन में ठहराव लायें! यह आपको आपके सही मार्ग के सामने लाकर रख देता है! अनायास /सहायास कुम्भक इस ठहराव में काफी अहम भूमिका निभाता है! यह आत्मिक उन्नति का सहज मार्ग है! आपका ठहराव ही ईश भाव को आने का मौका देता है! ईश्वर आपमें उतरने लगते हैं! शरीर में विद्युत की मात्रा बढ़ने लगती है! शरीर के विभिन्न हिस्से सक्रिय हो उठते हैं! शरीर में स्पन्दन अनायास ही होने लगते है! बस आप ठहराव को, कुम्भक को, ईश्वर को प्रश्रय देते चले जायें, मार्ग सुगम से सुगमतर होता व दिखता चला जाता है!

इंसान जब ईश्वर के पीछे जब लग जाता है या ईश्वर को पाना चाहता है, महामाया अपना जाल जीव पर फेंकती है! उसे नाना तरह के परीक्षाओं या कहिये मुसीबतों के द्वार पर खडा कर देती हैं! जीव जब अत्यन्त अकुला जाता है या कहिये धैर्य खोने लगता है तब उसका सही समय शुरु कर देते हैं ताकि वह सांसारिक आनन्द मे खोया रह जाये! और लगभग यही होता है अधिकांश मनुष्यों के साथ! इस तरह दु:खों एवं सुखों के द्वन्द्व में इंसान को भटकाते रहती है! पर हम महामाया के इस माया को देखें व समझें व अपने लक्ष्य से भ्रमित न हों! महामाया ! न यह ईश्वर को छोडेगा न आपको! चौकन्ना रहिये! भ्रमित हों या सुखी या दु:खी पीछा नहीं छोडंनेवाले हैं! आप जोर लगायें, लगाते रहें, फिर भी पीछा न छोडेंगे, लगे रहेंगे!!

नचिकेता को जब पता चला कि यमराज के पास उन्हें ब्रह्म ज्ञान मिल जायेगा, तब यमलोक यम के द्वार जा पहुँचे! यमराज उस समय यमलोक से बाहर किसी कार्यवश गये हुये थे! नचिकेता द्वार पर खड़े हो गये! कुछ दिन बाद [३ महीने] जब वापस आये तब उन्हें द्वार पर मानुष गन्ध तीव्रता से लगा! यह उन्हें अति असहनीय लग/हो रहा था! यमराज उन्हें द्वार से हट जाने को कहे ताकि अन्दर जा सकें!  नचिकेता वहाँ से नही हटे और अति नम्रता से अपने आने का प्रयोजन बताया! उन्हें ब्रह्मज्ञान देने को कहा! यमराज ने कहा कि यह शरीर रहते यह प्राप्त न होगा! यमराज कुछ और माँगने के लिये कहा! पर नचिकेता अपनी माँग पर डटे रहे! यमराज ने अन्त में कोई उपाय न देखक़र कहा कि - आप ब्रह्म को प्राप्त हो जाओ!

Bhagwan RamKrishna Dev

खुदीराम के तनय दुलारे, चन्द्रामणि माँ के दृग तारे

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