वज्रगृह की मोटी बेड़ी ने
बेधा देह बना अंतस् हाला
परतंत्रता की कसक से कवि ने
पी ड़ाला प्याले पर प्याला

ताज की थी फीक्र किसे
खाक छानता चला आया

रंग पड़ गये सारे जब फीके
चमक उठी कवि की मधुशाला