हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना
निष्फल नीरस शुष्क जीवन में
धारा ईश प्रेम की बहाना
माधुर्य, कांति और ओज देने
हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना ||१||
भाव-पक्ष के तीखे मोड़ों से
मन जब भी घबराये
प्रभु ड़गर दिखनी बन्द हो
भव-बन्धन प्रेत डराये
चुपके चुपके रोज मुझे बहलाना
हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना ||२||
कर्म के भयंकर झंझावात में
सहमा-सिकुडा जब रोऊँ
शांत चरण हो उपलब्ध मुझे
तेरे चरण अहं से धोऊँ
पारलौकिक जीवन का ककहरा मुझे सिखलाना
हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना ||३||
कलश प्रेम का रहे भरा निरन्तर
न रहे मायूशी और हताशा
निर्धन-धनी का खत्म हो अन्तर
बसे दिलों में भक्तिपूर्ण आशा
ब्रह्म दर्शन के विकल्प सभी जुटाना
हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना ||४||
क्षुद्र सोचों से क्षुब्ध अकिंचन
माँगे भला क्या और
उदार हृदय की डोली मिल पाये
तेरे अलौकिक द्वार पर ठौर
समाधि-सुख में मुझे ना भुलाना
हे अखिलानन्द ! ‘गीता’ का चोला पहनकर आना ||५||






