इस संसार में ही रहकर अध्यात्म पुष्ट होता है

अत: अपने संसार को भी पुष्ट करते हुये बढ़ते चलें

अत: संसार व  अध्यात्म  एक-दूसरे के  प्रगति में पूरक व सहायक हों