अनगिन वर्षों से कवि ने
अपने अन्दर संजोयी हाला
अमिय सुधा रस मिष्ट मधु
या फिर विष का  हो प्याला

आज सुदिन है माँ श्वेता ने
जड़ता जिह्वा की तोड़ी है
अब सजाएगा हर दिन कवि
अपनों के संग मधुशाला